भवानीपुर:- मुकेश झा संवाददाता। क्षेत्र सहित विभिन्न स्थान खपरी, भवानीपुर रीवाडीह भरुवाडीह हरिनभट्ट सहाड़ा वटगन सिसदेवरी दतरेंगी गिधपुरी कुची जुनवानी सुंदरी सुंदरवन ओडान सेमरिया में वट सावित्री व्रत महिलाओं ने अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु की आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए व्रत रखी प्रातः काल उठकर पूजन सामग्री के लिए फूल माला मिठाई अक्षत आम केला रक्षा सूत्र आदि मधुर मिठाई के साथ बरगद वृक्ष स्थान पर जाकर विधि विधान पूरा पूजा अर्चना करते हुए अपने पति बच्चे परिवार एवं गांव की खुशहाली की कामना करते हुए पूजा किऐ पंडित उमाशंकर तिवारी एवं पुष्पा तिवारी ने कथा सुनाया की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है इसी वृक्ष के नीचे यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटाए थे यही कारण है कि इस व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है और उसकी परिक्रमा करके अखंड सुहाग की कामना की जाती है।सावित्री के अटूट पतिव्रत और प्रेम की अमर कहानी है इसके अनुसार, सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे इस व्रत को करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य, घर पर सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्ति होती है।सावित्री का जन्म और विवाह प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी कन्या का वरदान दिया, जिसका नाम सावित्री रखा गया सावित्री जब बड़ी हुईं तो अत्यंत रूपवान और गुणवती थीं। उनके लिए सत्यवान नामक युवक को चुना गया, जो शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। सत्यवान बहुत धर्मात्मा थे, लेकिन उनका राज्य छिन गया था और उनके माता-पिता नेत्हीन थे, जिसके कारण वे जंगल में एक पर्णकुटी में रहते थे।नारद मुनि की भविष्यवाणी जब सावित्री के विवाह की बात चली, तो देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी यह सुनकर राजा बहुत चिंतित हुए और उन्होंने सावित्री से किसी अन्य से विवाह करने का आग्रह किया। लेकिन सावित्री अपने निश्चय पर अटल रहीं और उन्होंने कहा कि वे सत्यवान को ही अपना पति मान चुकी हैं और उसी से विवाह करेंगी। अंतत दोनों का विवाह हो गया।सत्यवान की मृत्यु और यमराज का आगमन विवाह के बाद सावित्री ने राजसी ठाठ-बाट त्याग दिए और जंगल में सत्यवान और अपने सास-ससुर की सेवा करने लगी नारद मुनि द्वारा बताई गई मृत्यु की तिथि जैसे ही समीप आई, सावित्री ने तीन दिन का कठोर उपवास निर्जला व्रत शुरू कर दिया जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी, वे सावित्री के साथ जंगल में लकड़ियां काटने गए। अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वे बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े उसी समय मृत्यु के देवता यमराज अपने पाश फंदे में सत्यवान के प्राण बांधकर दक्षिण दिशा की ओर ले जाने लगे सावित्री भी चुपचाप यमराज के पीछे-पीछे चल दीं।यमराज के वरदान यमराज ने सावित्री को वापस लौटने को कहा लेकिन सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म और प्रेम का परिचय देते हुए कहा कि वे अपने पति के साथ ही रहेंगी सावित्री की निष्ठा और ज्ञान भरी बातें सुनकर यमराज प्रसन्न हुए और उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा, लेकिन शर्त रखी कि वे सत्यवान के प्राण नहीं मांग सकतीं सावित्री ने पहला वरदान अपने नेत्रहीन सास-ससुर के लिए राज्य और उनकी आंखों की रोशनी मांगी।दूसरा ंवरदान अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का राज्य मांगा तीसरे वरदान में उन्होंने खुद के लिए सत्यवान से सौ पुत्रों की माँ बनने का वरदान मांगा सत्यवान का पुनर्जीवन:तीसरे वरदान में सत्यवान के पुत्र की बात थी, इसलिए यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने ही पड़े यमराज ने सावित्री को सत्यवान के प्राण सौंप दिए और अंतर्ध्यान हो गए सावित्री वापस उसी स्थान पर आईं जहाँ सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था। यमराज के आशीर्वाद से सत्यवान ऐसे उठ बैठे जैसे गहरी नींद से जागे हों इसके बाद दोनों अपने राज्य और माता-पिता के पास सकुशल लौट आऐ इसलिए स्थिति को देखते हुए हम सभी नारी धर्म का पालन करते हुऐ सनातन धर्म का पालन अवश्य करें जिससे हमारा परिवार सुखमय जीवन यापन करते रहे। इस अवसर पर प्रीति झा, पुष्पा तिवारी, खुशबू चंद्राकर, तनु चंद्राकर, भुनेश्वरी शर्मा ,मिनी कचंंन रोमा ममता, सिमरन चंद्राकर, सरिता, पुजा, मोनीका,चंद्राकर, कल्पना साहू , पल्लवी साहू, सहित क्षेत्र की महिलाऐ बड़ी संख्या में उपस्थित होकर पूजा अर्चना की







