कवर्धा, 26 अप्रैल 2026:-वन्यजीव संरक्षण के दावों के बीच कवर्धा वन मंडल से एक चिंताजनक खबर सामने आई है, जहां एक वयस्क गौर (बायसन) की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। 25 अप्रैल की रात करीब 9:30 बजे इस घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग की कार्यप्रणाली और दावों पर सवाल उठने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि यह वही गौर है, जिसे कुछ समय पहले शिकारियों द्वारा मारे गए तीरों से घायल अवस्था में बचाया गया था। उसके शरीर में तीन तीर धंसे हुए थे और वन विभाग द्वारा जटिल ऑपरेशन कर उसे उपचार के बाद स्वस्थ घोषित किया गया था। विभाग ने प्रेस नोट जारी कर लगातार उसके ठीक होने का दावा भी किया था।
इलाज के बाद जंगल में छोड़ने पर सवाल
घायल गौर का उपचार पंडरिया (पूर्व) वन क्षेत्र में किया गया था। उपचार के बाद उसे “सुरक्षित और स्वस्थ” बताते हुए जंगल में छोड़ दिया गया। लेकिन अब उसकी अचानक मौत ने इस निर्णय को कठघरे में खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने गंभीर रूप से घायल वन्यजीव को ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक नियंत्रित वातावरण में निगरानी की जरूरत होती है।
सूत्रों के अनुसार, गौर के पैरों की मांसपेशियों में गहराई तक तीर धंसे हुए थे, जिससे संक्रमण और अन्य जटिलताओं का खतरा बना हुआ था। ऐसे में भीषण गर्मी के दौरान उसे खुले जंगल में छोड़ देना एक जोखिम भरा फैसला माना जा रहा है।
कानूनी प्रावधानों के तहत गंभीर मामला
गौर को **वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972** के तहत अनुसूची-1 में शामिल किया गया है, जिससे उसे सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा प्राप्त है। इस श्रेणी में आने वाले वन्यजीवों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध है और इन्हें राज्य की संपत्ति माना जाता है। ऐसे में यदि किसी संरक्षित जीव की मृत्यु लापरवाही के कारण होती है, तो यह गंभीर कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है। दावों और वास्तविकता में अंतर
वन विभाग की ओर से लगातार गौर के स्वस्थ होने की जानकारी दी जा रही थी, लेकिन अचानक हुई मौत ने इन दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि वास्तविक स्थिति अलग थी, तो यह जनता को भ्रमित करने जैसा मामला भी बन सकता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण केवल बचाव और उपचार तक सीमित नहीं होता, बल्कि पूरी तरह स्वस्थ होने तक निरंतर देखभाल और निगरानी भी आवश्यक होती है।
जवाबदेही तय करने की मांग
इस मामले में पहले ही शिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर उन्हें जेल भेजा जा चुका है, जिसे एक सकारात्मक कदम माना गया था। लेकिन अब जब संरक्षित वन्यजीव की मौत हो चुकी है, तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।
स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि इस मामले में एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की जाए और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि मौत के वास्तविक कारणों का खुलासा हो सके। यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों पर भी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
संरक्षण व्यवस्था पर बड़ा सवाल
गौर देश का सबसे बड़ा जंगली गोवंश है और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जैव विविधता से समृद्ध छत्तीसगढ़ में इस तरह की घटना वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की गंभीर परीक्षा के रूप में देखी जा रही है।
यह घटना केवल एक वन्यजीव की मौत नहीं, बल्कि पूरे संरक्षण तंत्र की जवाबदेही का मुद्दा बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून की सख्ती तभी प्रभावी होगी, जब उसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की जाए।







