कवर्धा:- कवर्धा में आरक्षक भर्ती की दूसरी सूची को लेकर चल रहे प्रदर्शन की दो दिनों की दो तस्वीरें…


पहले दिन गृहमंत्री विजय शर्मा खुद अभ्यर्थियों के बीच पहुंचे।
कुर्सी पर बैठने के बजाय जमीन पर बैठे…
और काफी देर तक उनकी बातें सुनीं।
तस्वीर में एक तरफ अपनी मांग को लेकर बैठे अभ्यर्थी थे…
तो दूसरी तरफ उनके बीच बैठकर बात सुनते गृहमंत्री।
उम्मीद थी कि बातचीत से कोई रास्ता निकलेगा।
लेकिन अगले दिन तस्वीर बदल गई।
गृहमंत्री एक बार फिर अभ्यर्थियों से मिलने पहुंचे,
लेकिन इस बार उन्हें कार्यालय के अंदर जाने से ही रोक दिया गया।
यानी 24 घंटे के भीतर तस्वीर बदल गई…
पहले जमीन पर बैठकर संवाद की कोशिश,
और अगले दिन कार्यालय तक पहुंचने में भी रुकावट।
सवाल ये नहीं कि अभ्यर्थियों की मांग सही है या गलत।
सवाल ये है कि जब किसी समस्या के समाधान के लिए बातचीत का रास्ता खुला हो,
तो क्या उसे बंद कर देना समाधान की दिशा में कदम है?
लोकतंत्र में सवाल पूछना भी जरूरी है…
अपनी मांग रखना भी जरूरी है…
लेकिन संवाद की गुंजाइश बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
कवर्धा की ये दो तस्वीरें सिर्फ एक प्रदर्शन की कहानी नहीं कहतीं…
ये बताती हैं कि बातचीत से शुरू हुआ मामला आखिर टकराव तक कैसे पहुंचा।
अब जरूरत इस बात की है कि दोनों पक्ष फिर से बातचीत की मेज पर आएं…
क्योंकि मांग का समाधान चाहिए,
तो संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए।


























































































































