कवर्धा:- भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त, मां कर्मा देवी, जिन्हें कर्मा बाई के नाम से भी जाना जाता है, की भक्ति और श्रद्धा की अद्भुत कथा आज भी जन-जन में पूजनीय है। उनका जन्म चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को झांसी, उत्तर प्रदेश के साहू परिवार में हुआ था।

भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त
मां कर्मा देवी का जन्म विक्रम संवत 1073 ई. में हुआ था। वे बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनकी भक्ति अप्रतिम थी। दिन-रात श्रीकृष्ण के भजन-पूजन, ध्यान और आराधना में उनका मन लगा रहता था। कहते हैं कि उनके भजन सुनकर भक्तों का मन झूम उठता था और सभी को भगवान की उपस्थिति का अनुभव होता था।
खिचड़ी का अद्भुत प्रसाद और भगवान का प्रेम
मां कर्मा देवी रोज भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का भोग लगाती थीं। ऐसी मान्यता है कि भगवान स्वयं उनके हाथों से बने खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करते थे। आज भी जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी का भोग अर्पित किया जाता है, जो मां कर्मा देवी की भक्ति का प्रतीक है।
सती होने का संकल्प और श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन
जब मां कर्मा देवी ने अपने पति के निधन पर सती होने का संकल्प लिया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह समझाया कि गर्भवती स्त्री का सती होना धर्म के विपरीत है। भगवान की इस प्रेरणा से उन्होंने अपने जीवन को धर्म और भक्ति के मार्ग पर समर्पित कर दिया।
धर्म और समाज सुधार की प्रेरणा
मां कर्मा देवी का जीवन न केवल भक्ति की गहराइयों को दर्शाता है, बल्कि समाज सुधार की प्रेरणा भी देता है। उनका परोपकारी स्वभाव और समाज कल्याण की भावना आज भी अनुकरणीय है।







