कवर्धा:- जिले के छोटे से ग्राम भठैलाटोला के किसान श्री सम्मन लाल साहू के पुत्र डॉ. (प्रो.) मोतीराम साहू को उनके उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ है। प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित उनके शोध “एंड्रोग्राफिस पैनुकुलाटा (कालमेघ) का फाइटोकेमिकल विश्लेषण एवं इन-सिलिको एंटी-डायबिटीज मूल्यांकन” से प्रभावित होकर उन्हें 6th Annual Congress on Plant Science and Biosecurity (छठवां अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पादप विज्ञान एवं जैव सुरक्षा) में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया है।

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 22–23 जून 2026 को बार्सिलोना, स्पेन में आयोजित होगा, जिसमें विश्वभर के वैज्ञानिक, शोधकर्ता एवं शिक्षाविद भाग लेंगे। आयोजन समिति द्वारा भेजे गए आमंत्रण पत्र में डॉ. साहू की विशेषज्ञता की सराहना करते हुए उन्हें अपने नवीनतम शोध कार्य पर व्याख्यान प्रस्तुत करने हेतु आमंत्रित किया गया है। कांग्रेस की ओर से भौतिक रूप से उपस्थित न हो पाने की स्थिति में वर्चुअल माध्यम से भी व्याख्यान देने का निवेदन किया गया है।

डॉ. साहू के अध्ययन में कालमेघ के फाइटोकेमिकल घटकों—एंड्रोग्राफोलाइड, β-सिटोस्टेरॉल एवं फ्लेवोनोइड्स—का विश्लेषण किया गया है। शोध के अनुसार, ये सक्रिय तत्व टाइप-2 मधुमेह के प्रबंधन में सहायक हो सकते हैं। कंप्यूटर सिमुलेशन (इन-सिलिको अध्ययन) एवं प्रयोगशाला परीक्षणों से प्राप्त परिणामों ने संकेत दिया है कि कालमेघ मधुमेह नियंत्रण में प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
कालमेघ, जिसे “किंग ऑफ बिटर” या “भुईनीम” भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है। इसका उपयोग विशेष रूप से लिवर संबंधी रोगों जैसे पीलिया एवं फैटी लिवर के उपचार में किया जाता है। इसके अतिरिक्त, इसमें एंटी-वायरल एवं एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जो मलेरिया, टाइफाइड, सर्दी-जुकाम तथा विभिन्न प्रकार के बुखार में लाभकारी माने जाते हैं। यह पाचन तंत्र को सुदृढ़ करने, रक्त शुद्धिकरण, त्वचा रोगों में राहत तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है।
डॉ. मोतीराम साहू वर्तमान में विज्ञान महाविद्यालय, दुर्ग में पदस्थ हैं। वे पिछले कई वर्षों से सिकल सेल एनीमिया (सिकलिंग) जैसे गंभीर विषय पर निरंतर शोध कर रहे हैं तथा समाज में इस बीमारी के प्रति जागरूकता लाने के लिए सक्रिय हैं। उनका मानना है कि सही जानकारी एवं समय पर बचाव से इस गंभीर बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।
डॉ. साहू को प्राप्त यह अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि उनके गांव जिले एवं समूचे छत्तीसगढ़ के लिए भी गौरव का विषय है। उनके इस चयन से क्षेत्र के युवा शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं समाज को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्कृष्ट कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।







