बालोद, छत्तीसगढ़:- बालोद जिले की रहने वाली भुवनेश्वरी माता ने अपने पति संतोष की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और शांति की कामना के लिए परंपरागत रूप से वट सावित्री व्रत का पालन किया। उन्होंने वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की और दांपत्य जीवन की मंगलकामनाएं कीं।
इस विशेष अवसर पर पूजा के लिए वट वृक्ष, बरगद का फल, सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर, भिगा हुआ काला चना, कलावा, सफेद कच्चा सूत, रक्षासूत्र, बांस का पंखा, सवा मीटर का कपड़ा, लाल और पीले फूल, मिठाई, बताशा, फल, धूप, दीपक, अगरबत्ती, मिट्टी का दीया, सिंदूर, अक्षत, रोली, पान का पत्ता, सुपारी, नारियल, श्रृंगार सामग्री, जल कलश और पूजा की थाली आदि का उपयोग किया गया। साथ ही व्रत कथा का पाठ कर पूजन को पूर्ण किया गया।
वट वृक्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
वट वृक्ष (बरगद) को भारतीय संस्कृति में देव वृक्ष माना गया है। मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश और माता सावित्री इसी वृक्ष में निवास करते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार प्रलय के समय भगवान श्रीकृष्ण इसी वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे। गोस्वामी तुलसीदास ने वट वृक्ष को तीर्थराज का छत्र कहा है।

इस वृक्ष को न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इसकी दीर्घायु, विशालता और छायादार प्रकृति इसे जीवनदायिनी बनाती है। वट सावित्री व्रत महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु एवं परिवार की समृद्धि के लिए किया जाने वाला अत्यंत पवित्र और श्रद्धापूर्ण पर्व है।
भुवनेश्वरी माता की यह पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण संरक्षण की चेतना को भी आगे बढ़ाने वाला एक प्रेरणादायी उदाहरण है।







