पंडरिया, 15 सितंबर 2025:- गोंडी धर्म संस्कृति संरक्षण समिति की ब्लाक इकाई पंडरिया द्वारा गोंडवाना गुरूदेव दुर्गे भगत जगत जी का भव्य स्वागत किया गया। गोंडवाना गुरूदेव अपने धार्मिक कर्तव्यों के साथ पंडरिया पहुंचे और यहां की प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम विशेष रूप से चिल्हीडार महापूजा एवं बेटा जौतिया महाव्रत के आयोजन के संदर्भ में था, जो 15 सितंबर 2025 को कवर्धा में आयोजित होने वाला था।
इस अवसर पर गोंडवाना गुरूदेव ने पंडरिया में अल्प समय के लिए ठहरकर गोंडी संस्कृति और धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने चिल्हीडार महापूजा के बारे में बताया कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें मातृ शक्ति विशेष रूप से निर्जला व्रत रखती हैं। यह व्रत संतान सुख और दीर्घायु के लिए किया जाता है। साथ ही, गोंडवाना गुरूदेव ने यह भी बताया कि गोंडी संस्कृति अन्य धर्मों और संस्कृतियों से बिलकुल अलग है और इसमें प्रकृति की पूजा की जाती है।
**गोंडी धर्म की अनूठी पहचान**
गोंडवाना गुरूदेव ने इतिहास के संदर्भ में बताया कि 1871 में हुए पहले जनगणना में आदिवासी समुदाय को सभी धर्मों से अलग रखा गया था। तब से लेकर अब तक यह समुदाय अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। वर्तमान में भारत में 6 धर्मों को मान्यता प्राप्त है, लेकिन गोंडी धर्म और संस्कृति का स्थान इस सूची में नहीं है। उन्होंने उल्लेख किया कि 2011 की जनगणना में गोंडी धर्म के अनुयायियों की संख्या लगभग 10 लाख थी, जबकि उरांव भाई सरना धर्म के अनुयायियों की संख्या 1 करोड़ थी। हालांकि, अब 7वें कॉलम को हटा दिया गया है, जिससे गोंडी समुदाय के धर्म को उचित मान्यता नहीं मिल रही है।
**आदिवासी समुदाय के लिए अलग धर्म कोड की मांग**
गोंडवाना गुरूदेव ने जोर देकर कहा कि आगामी जनगणना में आदिवासी समुदाय के लिए एक अलग धर्म कोड की आवश्यकता है, ताकि गोंडी धर्म की विशेष पहचान बनी रहे। उन्होंने कहा कि सरकार को गोंडी धर्म के अनुयायियों को 7वें कॉलम के तहत अलग धर्म कोड प्रदान करना चाहिए, जिससे इस संस्कृति और धर्म को उचित मान्यता मिल सके। गोंडी समुदाय का इतिहास, परंपरा और संस्कृति बहुत पुरानी और समृद्ध है, और इसे पूरी दुनिया में पहचान दिलवाने की आवश्यकता है।
**समापन संदेश**
इस कार्यक्रम के दौरान गोंडवाना गुरूदेव ने गोंडी समुदाय को एकजुट रहने और अपनी संस्कृति को संरक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि गोंडी धर्म केवल एक आस्थापंथ नहीं, बल्कि यह हमारे जीवन जीने की एक शैली है, जिसमें प्रकृति की पूजा, पारंपरिक रीति-रिवाज और सांस्कृतिक धरोहर का गहरा सम्मान किया जाता है।
गोंडी धर्म की अनूठी पहचान और उसकी संरक्षण की दिशा में गोंडी समाज की यह एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है। आगामी जनगणना में गोंडी धर्म को अलग कोड मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे इस समाज को अपनी संस्कृति और धर्म की असली पहचान मिल सकेगी।







